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  प्रा चीन भारतीय इतिहास को टटोलने से यह पता चलता है कि बुद्ध (ई.सा.पु.५६३) पूर्व काल में दो सभ्यताए थी. पहली श्रमण और दूसरी ब्राह्मण. पहली प्राक्रुतिक चीजों को भगवान मानती थी और उसकी पूजा अर्चा भी करती थी. तो दूसरी अप्राकृतिक अर्थात अलौकिक कल्पनाओ के भगवान मानती थी और उसकी पूजा अर्चा भी करती थी. पहली के ईश्वर वास्तविक दुनिया से होते थे, तो दूसरी के ईश्वर अवास्तविक दुनिया के होते थे. वान, काया, शरीर, वनस्पति और प्राणी यह भग, छिद्र, भोक, गड्डे से निकलते है इसलिए उसे “भगवान” कहा गया. भोक से निकलनेवाले चीज को “भगवान” कहा गया. अर्थात भग = भोक और वान = शरीर यानि ‘भगवान’. स्त्री-पुरुष के शंकर, मिलन, सहवास, सम्भोग से संतति, परिवार बनता है. इसलिए उसे प्रतीक स्वरुप भगवान शंकर को अपनाया गया, उसकी मुर्तिया बनायीं गयी, उन्हें पुँजा गया. जहाँ पर भी शंकर भगवान की मुर्तिया होती है उसके ठीक सामने ही (स्त्री) लिंग और (पुरुष) पिंड होते है, जो एक दुसरे के साथ दिखाए जाते है. इंसाने के माता-पिता ही उसके असली भगवान् है और संताने उसकी (माता-पिता की) भक्त है. शंकर के मंदिरों में जाकर ही पूजा, भक्ति, भाव क...